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✺ श्री मार्तंड बावनी ✺

जय गुरू नाना दीन दयाल, तुम भक्तो के नाथ कृपाल ।
स्मर्तृगामि तुम जगदाधार, अंतर्यामी सुख साकार ।
रूप तुम्हारा नित्य सनातन, दत्तगुरू के तुम प्रिय भूषण ।
तुम शांती के अथांग सागर, महिमा तेरी श्रुती अगोचर ।
मंगलमय प्रभू नाम तुम्हारा, जीवन का है ये उजियारा ।
महिमा तेरी प्रभो अपार, जो कोई गावे मिले आधार ।
चरण तुम्हारे प्राण हमारा, जुग जुग चाहत यही सहारा ।
जो कोई आवे शरण में नाना, मिटते हैं उनके भय नाना ।

परमपावन ध्यान तुम्हारा, हर लेता हैं तम अंधेरा ।
हास्य तुम्हारा मन हर लेता, पग पर जीव सुख पाता ।
जलबिन मछली हो निष्प्राण, तुमबिन वैसा तन धन मान ।
सूक्ष्म रुप से लीला अदभुत, आपकी करनी आपही जानत ।
भक्तवत्सल तुम दीन दयाल, हतप्रभ होवे काल कराल ।
जिसके मन में श्रध्दा जैसी, आपकी मुर्ती दिखती वैसी ।
योगप्रेमी को योगी दिखते, ज्ञानप्रेमी को ज्ञानी दिखते ।
भक्तीप्रेमी को दिखते भक्त, लीला आपकी यह अदभुत ।

संतो के तुम सादर प्रेमी, नाना रूपे तुमी अनामी ।
जो कोई आवे शरण तुम्हारे, पूर्ण होते काम अधूरे ।
दासी सिध्दि उनकी होती, जिनकी नाना पर दृढी प्रीति ।
रंग भजन का तुम्ही दिखाते प्रेम सरोवर सब हो जाते ।
दे दो हमको यही प्रसाद, रहे तुम्हारी क्षण क्षण याद ।
स्मरण करे जो कथा तुम्हारी, मिलते उनको फल सुखकारी ।
प्रसाद पाया रेवामाई से, खिल जाता है चित्त शांती से ।
देखे तुमने दशरथनंदन, छूटते है पापो के बंधन ।
देखे तुमने देवकीनंदन मिलते है भक्ति के स्पंदन ।
किया मुक्त वह ब्रह्मसमंध, सब बाधों का टुटे बंध ।

अनसुया ने दिया प्रसाद, मिलता है प्रीति का स्वाद ।
शंकरजी का महान दर्शन, फल यात्रा का मिलता पावन ।
आठ रूप जब हुआ विहार, आधिव्याधिका हो संहार ।
अवधुतजी ने किया प्रहार, तीन ताप का हो संहार ।
गंगोत्री और जमनोत्री, लीला है सुख दात्री ।
लीला तुमने न्यारी दिखाई, बिना तेल से गाडी चलाई ।
तेज दृष्टि का प्रभो शुभंकर, कुण्ड में आया श्री वैश्वानर ।
शब्द तुम्हारा हो संजीवन, भक्त हुआ एक यर्जु भूषण ।
डरकर भागे दूत मौत के दुर, हुए सब ताप साध्वी के ।
सपनों में जब पाया दर्शन, गुंगा बोले मधुर वचन ।
श्वानरूप में भैरव आये, रोटी खाकर तृप्त हो गये ।
पूर्ण कामना रामबाई की, देखी झांकी सीताराम की ।
वैद्यराज कभी तुम बन जाते, कर्मचारी भी कभी हो जाते ।
धनहिन को मिलता धनमान, विद्याहिन को विद्यादान ।
उदर पीडा जब हुई भक्त को, मुक्त किया और दिया सौख्य को ।
लाखों आते तेरे दरबार, पुरण होते सब व्यवहार ।
भक्तो का भुगतान भोग कर, देते शांती ना भी कहकर ।
विभूती पाकर हर गुरूवार, चित्त तृप्ती का करे विहार ।
पुत्रहीन जो पाता संतान, कृपा आपकी यही महान ।
पति प्राप्ति की जिनकी इच्छी, पुरण होती उनकी वांच्छा ।
तुम तो नाना तुर्यातीत, कैसी पूजा समझ न आवत ।
मैं नौकर तुम स्वामी शुभंकर, भाव रहे यह मन में निरंतर ।
रोम रोम में वास तुम्हारा, भिक्षा मांगे दास तुम्हारा ।
तिथी पंचमी पर बावनी गावे, पांच पाठ मे सुख पावे ।
पांच पाठ बावन गुरूवार, समझ मे आवे सार असार ।
जो चाहे वह मिले पाठ से, दे दो आशिष प्रसन्नता से ।
दे दो आशिष प्रसन्नता से, दे दो आशिष प्रसन्नता से ॥

॥ अवधुत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त ॥

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